वो पहली झलक!

0
453

याद है वो पहली झलक
जिस रोज़ तुझे देखा था,
कुछ महसूस दिल को हुआ
कुछ अंदर ही बस के रह गया।

हुई न हिम्मत तुमसे कुछ कहने की
दिन बीत गए एक लफ्ज़ कहने में,
आया वो दिन जब खुसनसीबी मुझसे मिली
घर कर गये तेरे कहे हुए वो शब्द मेरे सिने में।

उसी वख्त दिल ने कुछ हरकत की
इश्क़ में इतना हारा मैं,
ये तेरे नजरों ने क्या किया
शायद मुझे तुझसे प्यार हो गया।

गिर तो गया था मैं तेरे प्यार में
ध्यान कहाँ था आने वाले उस ज्वार का,
हाँ हो गयी वो गलती मुझसे
सच्चा सा प्यार जो कर बैठा।

पर तुझे तो उस राह की मंज़िल प्यारी थी
जिसका राही भी तू और कसौटी भी तू,
दिल करता था तुझसे कहूँ, तेरी आशिक़ी तेरे नाम कर दूँ
सौदा तेरी वफ़ाई का कर हीं लिया था, तेरी रेत की परछाईं को अपना मुकद्दर चुन हीं लिया था।

फिरता हूँ अब मारा-मारा मैं
जाने कौन है तू मेरी मैं ना जानु,
तब भी खुद को बर्बाद करता हूँ
फना हो के तुझसे मिलता हूँ।

तेरे लिए जी कर कुछ पल मैं जी जाता हूँ,
क्यूँ की मेरे लिए तू एक ही लफ्ज, एक हीं नाम है,
आशिक़ी और सिर्फ मेरी आशिक़ी
वो आशिक़ी जो तुझसे शुरू और मुझपे हीं आकर खत्म हो जाती है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here