जो तेरी हँसी को देखा इस बार

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जो तेरी हँसी को देखा इस बार
बेरहम-सी जिंदगी फिर से गुलजार हो गयी है,
एक फरियाद मेरे दिल में दबी थी जैसे
वो हँसी देख कर मैं फिर से जी गया।

उम्मीद तो न थी तुझसे मिलने की
आँखें चुराने का मन होता था,
किस्मत का खेल है जनाब!
जिस नफ़रत को अपना लिया था मैंने,
आज उसी नफ़रत ने मुझे फिर से तेरा दीवाना कर दिया।

तुमसे नज़रें क्या मिली रौशन फिज़ाएँ हो गयी
आज बादलों का अलग रंग है,
चुभती सूरज की किरण भी अलग नूर बिखेरे है
मौसम बदलने लगा है जैसे,
शायद तुझसे इश्क़ दुबारा कर बैठा हूँ।

रेखाओं का खेल है मुकद्दर
रेखाओं से मात खा रहा हूँ,
पर होता है न की हारने का अपना मज़ा है
तेरी नफ़रत के आगे हार तो गया था,
पर उस हँसी को क्या बयां करूँ
जिसके आगे मेरा इश्क़ फिर से जीत गया।

जानता हूँ कुछ हो नहीं सकता है मेरे इश्क़ का
पर तुमसे जब बच के गुज़रता हूँ,
तो लगता है वो नज़र चुप के मुझे देख रही है
और खुदा भी मेरे इश्क़ की तेरे सामने गुहार कर रहा है।

2 COMMENTS

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