काश खता की सजा मिलती

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काश खता की सजा मिलती
पर यू ना बेवजह मिलती
दर्द देकर खुशी देने का फायदा क्या
बेवजह साथ रहने का फायदा क्या।

हंसी भी दर्द देने लगी है
यादें भी तनहा करने लगी हैं
जख्मों से ख्याल भरे हैं
बीते हुए लम्हें हमें ले कर बह रहे हैं।

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कैसे हकीकत छुपाऊ खुदसे
जब लोगों की नज़रे सवाल किया करती हैं मुझसे
भर आती है आंखें मेरी
क्योंकि चुब जाती हैं इस कदर बातें तेरी
तब भी मुस्कुराती रहती हूं
क्योंकि दूसरे मुझसे जुड़े हैं मैं तो बस यही हकीकत कहती हूं।

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